आज महाराष्ट्र सरकार और कंगना राणावत के बीच जंग तेज हो गई। कंगना राणावत जैसे ही मुंबई के लिए रवाना हुई अपने वादे के अनुसार। वैसे ही बीएमसी ने अपना एक दस्ता कंगना की ऑफिस को तोड़ने के लिए रवाना कर दिया और अधिकारियों ने कार्यालय के मुख्य द्वार पर चिपकाया फोटो खींचा और कुछ ही समय बाद मुख्य द्वार पर लगा ताला थोड़ा और अधिकारी कर्मचारियों सहित अंदर पहुंचकर और हो शुरू कर दी। प्राधिकरण एवं क्षेत्रीय नगरपालिका अवैध निर्माण पर कार्यवाही करने का अधिकार रखती है मगर कार्यवाही के नाम पर सरकारी दुश्मनी को अंजाम दिया गया साथ ही हाईकोर्ट के आदेशों का नहीं उल्लंघन किया गया। बीएमसी आज की गई तोड़फोड़ की कार्रवाई से सरकार की बदनामी के साथ-साथ कोट के आदेशों का उल्लंघन करने के दोषी हो गए बीएमसी के अधिकारी।
महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री का दामन इस मामले में काला हो गया अगर इस पूरे प्रकरण को मुख्यमंत्री का आशीर्वाद प्राप्त नहीं था तो उन्होंने बीएमसी के अधिकारियों को क्यों आदेश नहीं दिया की इस प्रकार की कोई भी कार्रवाई है ना की जाए। यहां एक सवाल और उठता है की क्या बीएमसी के क्षेत्र में अब कोई भी अवैध निर्माण बाकी नहीं है क्या इससे पूर्व बीएमसी इस क्षेत्र में कितने अवैध निर्माण के खिलाफ कार्यवाही की है।
महाराष्ट्र सरकार बनाम कंगना राणावत मामले से यह साफ हो गया कि क्या अब देश में अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त हो गई है। सरकार कोई भी हो किसी भी प्रदेश की हो या फिर केंद्र की हो मगर अपनी खामियों को सुनना ही नहीं चाहती है। इससे साफ है की कोई भी सरकार जब खामियां नहीं सुनना चाहती तो सुधार की उम्मीद भी समाप्त हो जाती है। महाराष्ट्र सरकार ने कांगड़ा को केवल आईना दिखाने पर ही दोषी मान लिया और उनका विरोध करते हुए मुंबई में ना घुसने की चेतावनी तक दे डाली और यहीं से विरोध शुरू हो गया।
सरकार जनता द्वारा चुने जाने पर पार्टी को बहुमत मिलने पर मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों जिम्मेदारी मिलती तो फिर जनता की आवाज को मंत्रियों द्वारा कैसे दबाया जा सकता है जनता को अपने आवाज उठाने का पूरा हक है और उसे पूरा करने की जिम्मेदारी सरकार की है। मगर ऐसा नहीं हो पाता है यह केवल एक दिखावा मात्र है। जब कंगना राणावत जैसे सुपरस्टार द्वारा आवाज उठाने पर इस तरह का हालात सरकार द्वारा पैदा किए जा सकते हैं तो अगर आम व्यक्ति आवाज उठाता है तो उसका क्या हश्र होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है क्या यही अभिव्यक्ति की आजादी है अगर हां तो फिर गुलामी ही बेहतर है।